मेडिकल वाली तैयारी – भाग 2

मेडिकल वाली तैयारी – भाग 1 से आगे…..

“भैया बताइए न क्या हुआ।”
हम पूछ ही रहे थे कि इतने में बीपी भैया खड़े हुए और कुछ बड़बड़ाने लगे।

“भैया आप क्या बोल रहे, कुछ समझ नहीं आ रहा। सब बाउंसर जा रहा है।”


भैया बोले, “तू अभी तक नही समझा! ये वही है जो अपने रॉकी रॉकस्टार, जीतो, अतुल, नरेंद्र किसी को नहीं छोड़ा। वे लोग भी इसी तरह मेरे पास आये थे, कम्बख़त यह फिजिक्स का भूत तुम पर भी आ गया ओफ़। मेडिकल की तैयारी करने वाले बच्चों पर कभी न कभी यह आती ही है। कहावत नहीं सुने हो ‘फिजिक्स के भूत, है कोई नहीं अछूत’!

ये सब सुन कर मेरा मन और घबराने लगा।
“ठीक है भैया, हम जाते हैं।”

“ओय! तू जा कहाँ रहा है, अभी तो सिर्फ बीमारी का पता चला है, इलाज तो करवाता जा।”

“इलाज?”

“हँ भाई इलाज़, क्यूं ऐसे ही रहना है?”

“नहीं भैया!,
हमको उपचार करवाना है, पर अभी आप ही बताए कि यह किसी को नहीं छोड़ता, फिर आप कैसे इलाज़?”

“भगवान के दया से तेरा भाई इससे बच गया, भाई अपना सेलेक्शन तो केमिस्ट्री ने रोक रखा है।”

इसके बादबीपी भैया ने एक पन्ना फाड़ा और उसपर कुछ लिखकर बोले,
“यह प्रेस्क्रिप्शन ले लो और इसमें जो लिखा है उसका सलीके से पालन करना।”

मैं पन्ना मोड़ कर जेब मे डाला, चप्पल पहना और सीधे अपना कमरा १०३ में।
कमरे में जाकर बिस्तर पर दीवार से पीठ लगा कर बैठा और पन्ना पढ़ने लगा। उसपर लिखा था…

डॉ बीपी
सुबह – चार बादाम फुला कर खाना है
दोपहर में – क्लास जाने से पहले तक 20 सवाल रोज
और आने के बाद 20 सवाल
एक नई किताब लेनी है – एस एल अरोड़ा
फॉर्मूला को लिख लिखकर दीवाल पर चिपकाना है
आगे से बहुत ज्यादा समस्या आने पर ही मेरे पास आना।
(सबसे नीचे – जो आया सो कम नहीं, नहीं आया तो गम नहीं)

इसे पढ़ने के बाद प्रतीत हुआ कि यह करने से शायद सब ठीक हो जाये। सोचा कहीं बल्ला बदलने से रन बनने लगे!! इसलिये अगले ही सुबह हम चले गए कालूसराय मार्केट नया बल्ला (किताब) लेने।

कुछ ही दिनों के भीतर ही भैया के सभी बातों पर अमल कर लिए थे। सवाल २-४ कम भी बने पर बादाम ४ से कम न हो इसका पूरा ख्याल रखा जाता था। धीरे -धीरे अपने नियमित कार्यक्रम में ऐसे उलझ गए कि अब क्लास में फिजिक्स सुनना ही छोड़ दिये, सोचता अपने पास तो किताब है ही।

बस केमिस्ट्री की क्लास गौर से सुन लेते, और जीव विज्ञान को यही कहकर टालते रहे कि इसको कभी भी पढ़ लेंगे। सारा दिन (२४×७) बस भूते उतारने में लगे रहते, अजी सारा दिन फिजिक्से बनाते। कभी एच सी वर्मा, डी सी पांडे तो कभी दिनेश, महेश, सुरेश पर अपना सर खपाते।

कुछ दिन बाद पहला ग्रैंड टेस्ट का घोषणा हुआ। अब ग्रैंड टेस्ट ट्रेंडिंग टॉपिक था। चाय के दुकान
से स्टेशनरी तक कोई भी दिख जाए, एक बार जरूर पूछ देता- और भाई, कैसी चल रही है ग्रैंड टेस्ट की तैयारी। उस माहौल ने इतना तनाव बना दिया था कि मुझे तैयारी चालू करनी ही पड़ी।

सर्वप्रथम सिलेबस पता किया और केमिस्ट्री क्लास में सुना था, तो उसको करने में जुट गए। जैसे तैसे एक अध्याय छोड़कर केमिस्ट्री की तैयारी लगभग हो गयी थी। अब टेस्ट में बस चार दिन बाँकी थे।

फिजिक्स में तो क्लास से हम बहोत पीछे ही थे, और जीव विज्ञान का सिलेबस देख कर लग रहा था कि पिछले ३ महीने में इस गेंद को हम इतना लीव कर चुके थे कि अब टेस्ट ड्रा करना भी मुश्किल था। खैर,जैसे तैसे ग्रैंड अभ्यास मैच खेलकर मैंगो शेक पीते हुए हॉस्टल आ
गए।

एक हफ्ते बाद परिणाम घोषित हुआ। जीवविज्ञान में मेरा अंक औसत से भी कम था, फिजिक्स में
साप्ताहिक टेस्ट के मुकाबले कुछ सुधार हुआ था और केमिस्ट्री में क्लास में ध्यान देने की वजह से सबसे ज्यादा अंक उसी में थे।

जैसे जैसे दिन बीता, दिल्ली के मैदान पर पैर जमने लगा था। जिस फिजिक्स के फुल टॉस गेंद पर भी हम बोल्ड हो जाया करते थे, उसके यॉर्कर पर भी अब २-५ रन बना ही डालते। धीरे धीरे इस बॉलर का डर जहन से निकलने लगा था। पर गलती यह हुई कि मैंने अपने कोच का बात सुनना भी छोड़ दिया मसलन मैं अब क्लास में या तो कम ही ध्यान देता या फिर जाता ही नहीं था।

अपने ऊपर इतना भरोसा कर बैठना ही जवानी का पहला लक्षण होता है, जो कि मुझमें साफ साफ देखे जा सकते थे। खुद से पढ़कर ज्ञान अर्जन तो किया जा सकता था परंतु, संतुलित आत्मविश्वाश और सीखने की प्रक्रिया किसी किताब में नही छपती।यह आपको गुरु से ही मिलता है, जिनसे मैं दूरी बनाकर अपनी ही हानि कर बैठा था।

मन मर्जी का मालिक बना मेरे साथ यह हुआ, कि साल के अंत तक जीवविज्ञान के आधे से ज्यादे पन्नों पर मेरा कलम तक नहीं चल पाया था। मेरे दोस्तों का भी हाल कुछ ऐसा ही था। वे फिजिक्स को लेकर चिंतित थे और मैं जीवविज्ञान को लेकर। कुल मिलाकर जिसने भी क्लास जाना छोड़ दिया था, उन सभी का हाल कमोबेश एक सा ही था।

इस कारण हुआ यह कि तीन चार टेस्ट ऐसे बीते जिसमे मैं फॉलो ऑन तक नहीं बचा पाया था।अंततः, तंग आकर मैंने टेस्ट देना ही बंद कर दिया और आ गया अपने शहर मधुबनी आने
वाले बोर्ड परीक्षा की तैयारी करने।

४० दिन बोर्ड के लिए पढ़कर अच्छा खासा अंक पा लिए थे हम। पेपर वगैरह में फोटो भी छप चुका था, मगर पीएमटी परीक्षा में वही हुआ जिसका मुझे पहले से डर था। जीवविज्ञान में एक दफ़ा फिर फिसड्डी साबित हो गए थे हम। घर आकर यह बोल दिए कि ठीक गया पेपर, लेकिन मनवा
जान गया था “बेटा इसबार तुमसे ना हो पायेगा”

परीक्षा के बाद हम भी वही कर रहे थे जो सब करते हैं। सुबह से लेकर शाम तक पूरा जिला नाप देते थे और पिताजी के नजरों से बचते हुए, खाना खाकर चुप चाप रात को सो जाते थे। जीवन ऐसे ही चल रहा था कि अचनाक एक शाम, दोस्त ने फोन कर बताया बिहार पी एम टी ‘प्री’ का परिणाम घोषित हो गया है। पिताजी परिणाम देखने गए और घर आधा किलो लडडू लेकर आए। दरअसल, मेरा चयन प्री में हो चुका था।

यह दिन ऐसा ही था, जैसे मेरा चयन रणजी में हो गया हो। रणजी में चयन होने से पूरे घर-परिवार, दोस्त, पड़ोसी सब लोगों तक बात पहुंच गई थी। अब साधारण मध्यवर्गीय परिवार का लड़का जिसके पूरे गांव में डॉक्टर नही हो, उसका चयन प्री में हो या मेन्स में हल्ला उतना ही होता है।

हम प्री निकलने की जश्न मनाने में ऐसा मशगूल हुए कि फाइनल मैच की तैयारी भी ढंग से नहीं कर
पाए। और हुआ यह कि हम रणजी के फाइनल (मेन्स परीक्षा) में शून्य पर आउट हो गए। कुछ लोग इसको गोल्डेन डक भी कह रहे थे।

खैर, अब फिर से निगाहें टिक गई एआईपीएमटी के परिणाम पर, जिसका मुझे
पहले से ही पता था। कुछ दिनों बाद औपचारिकता भी पूरी हो गई। परिणाम आने के बाद छन्न से आवाज हुआ और कुछ लोगों का सपना चकनाचूर हो गया था। दो-तीन दिन घर का ऐसा माहौल था जैसे वर्ल्ड कप के लीग स्टेज में ही बांग्लादेश से हारकर भारत टूर्नामेंट से बाहर हो गया हो। अंतर बस इतना था कि इस टीम के ग्यारहों खिलाड़ी हम ही थे, इसलिए हार का सारा ठीकरा मेरे सर ही फूटा था।

कुछ दिन बीतने पर पिताजी पूछे, ‘अब क्या करोगे? कुछ सोचा है?’
हम बोले एक साल और तैयारी करेंगे।

एक साल और खेलते हैं। टीचर्स का भी यही कहना है कि खेलना तो तुम सीख गए हो, पर तुम्हें अपने खेलने की शैली में बदलाव करने की कुछ आवश्यकता है और, किस गेंद को छोड़ना और किसे खेलना इसे सीखने की भी जरूरत है। कुछ चीज़ें सुधार लेने से शायद चयन हो जाए। जीव विज्ञान जैसे गुगली बॉलर को हल्के में लेकर हम ग़लती कर ही चुके थे।
अपने कोच को न सुनना भी मुझे महँगा पड़ा था। कुछ बातें भाग्य के मत्थे भी मढ़ दिया गया था।

ख़ैर दो चार दिन में यह फैसला हुआ कि अब मुझे दूसरे फ्रेंचाइज़ी के तरफ से खेलना चाहिए, शायद इससे चयन भारतीय टीम में हो जाए। यही सोचकर हम बैठ गए पटना कोटा एक्सप्रेस में और दिए खुद को साबित करने का एक और मौका।

ट्रेन में बैठते ही दोस्त का फ़ोन आता है- “अरे भाई पता चला, अपने बीपी भैया का
सेलेक्शन हो गया भाई”!!

तीसरा और आखिरी भाग बहुत जल्द!!….

– किशोर केशव, पटना मेडिकल कॉलेज

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